"फ्लैशबैक"
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फिल्मों में कहानी कहने की एक तकनीक होती है -फ्लैशबैक ! यानि वर्तमान से भूतकाल में छलांग लगा देना ! इस विधा के माध्यम से दर्शकों को वर्तमान का थोड़ा - बहुत बोध कराके फिर उनकी अंगुली पकड़ कर भूतकाल में कहीं भी घुमाया जा सकता है ! आज से कोई 27 साल पहले यानि 1993 में पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में जब मुझे फिल्म कला का गहराई से अध्ययन करने का अवसर मिला तो मुझे फिल्म की कहानी बयान करने की इस तकनीक के बारे में मशहूर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल जी से काफी कुछ सीखने समझने का अवसर मिला ! कहानी कहने की यह विधा सच में मुझे बेहद आकर्षक लगी थी ! शायद उनके इस बीजारोपण का ही रागात्मक असर रहा होगा कि जब मैंने अपने ब्लॉग का नाम तय करने के बारे में सोचा तो ज़हन में जो सबसे पहले नाम आया वह "फ्लैशबैक" ही था ! मैं गूगल वालों का शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने अपने ब्लॉग के लिए यह नाम रखने की स्वीकृति भी दे दी !
"फेसबुक" ,"व्हाट्सप्प" और "लिंक्डइन" पर तो काफी अरसे से अपने कोई चालीस हज़ार (40 000) मित्रों से नियमित रूप से जुड़ा हुआ हूँ , लेकिन सोशल मीडिया के इन लोकप्रिय माध्यमों की भी अपनी सीमाएं हैं ! बड़े लेख पढ़ने की अभी इन माध्यमों में रूचि जाग्रत नहीं हुयी है ,ऐसा मेरा मानना है ! हाँ "ब्लॉग" पर गंभीर , शोधपरक और बड़े लेख आजकल खूब पढ़े जा रहे हैं ! कवितायेँ , शायरी और यहाँ तक कहानियों पर एकाग्र ब्लॉग भी खूब लोकप्रियता बटोर रहे हैं ! यही नहीं ब्लॉग के लेखों एवं काव्य रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित होते हुए भी देख रहा हूँ ! ब्लॉग्स को लोकप्रिय बनाने में सबसे अहम् भूमिका "फेसबुक" निभा रहा है ! फेसबुक के अपने कुछेक मित्रों से अनुप्राणित होकर आगे मैं भी अपने ब्लॉग- "फ्लैशबैक " के ज़रिये नियमित रूप से रोचक एवं शोधपरक लेख प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा !
हिंदी सिनेमा और उसके गीत संगीत में मेरी बचपन से रूचि रही है ! मेरा बचपन रेडियो और ग्रामोफोन के लोकप्रिय युग से होकर गुज़रा तो ज़ाहिर है मेरे काफी लेख इन्हीं पर एकाग्र होंगे !
इनके अलावा मेरे जीवन में जिस शौक ने सबसे अधिक रागात्मक असर घोला वो अपने छोटे से गृह नगर छतरपुर (मध्य प्रदेश ) में गोवेर्धन टॉकीज में देखी गयी अनगिनत फ़िल्में , जिनकी कुनमुनाती अनगिनत यादें पिछले 60 सालों से मेरे पीछे पड़ी हैं ! बाद में मुझे देश के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों जैसे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन , नई दिल्ली (1977 -78 ), भारतेन्दु नाट्य एकेडेमी लखनऊ , नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा नई दिल्ली (1989 -1990 ) , फिल्म एण्ड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया पुणे , नेशनल फिल्म आर्काइव्ज , पुणे (1993 ) में अनेक गुणी जनों से थिएटर और सिनेमा कला को गहराई से जानने समझने का मौका मिला ! देश के श्रेष्ठतम समाचार पत्र समूह टाइम्स ऑफ़ इंडिया के दिल्ली और लखनऊ कार्यालयों में कोई 25 साल काम करने का मौका मिला ! अपने जीवन से इन तमाम ठिकानों से जुडी अनेक खट्टी मिट्ठी यादों , अपने अनुभवों और अर्जित जानकारियों को आने वाले दिनों में "फ्लैशबैक' के जरिये आप सबसे साझा करूँगा !