
आदरणीय शर्मा जी
मैं आपको अपना स्वयं का ब्लॉग शुरू करने पर हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। ईश्वर की असीम अनुकम्पा से आप हम सभी हिंदी प्रेमियों की भावनाओं को समूचे विश्व में प्रकाशित करते रहें।
भवदीय
अमित हंस
जिस देश में गंगा बहती है " और "तीसरी कसम" से जुड़ी मेरी बाल स्मृतियां ------------------------------ --------------------...
बचपन में एक संत वाणी सुनी थी -
जवाब देंहटाएं"शीर्यत इर्यत तत शरीरम"...
अर्थात जो मिट रहा है वो शरीर है ..
कल्पनाओं के पंखों पर इधर उधर ...
उडती फिरती अनगिनत इच्क्षाओं को समेटे ...
एक दिन मुझे भी माँ -बाबूजी की तरह ...
कूच करना होगा इस सरायफानी से...
एक दिन येसे ही अस्थियों को विसर्जित करने ...
आयेंगे मेरे बेटे भी गढ़ गंगा घाट....
और लील कर अवशेषों को गंगा ......
फिर उसी तरह शांत भाव से बहने लगेगी ....
जैसे कुछ हुआ ही न हो...
पर अपनी बारी मै चाहूँगा कि....
मेरे बेटे अस्थियों और राख के समस्त अवशेषों को....
मेरी तरह व्यर्थ न करें गंगा को विसर्जित करने में ...
कुछ राख- अस्थियाँ बचाकर ड़ाल दें....
घर के बगीचे में लगे गुलाब और गुढ्हल के पौधों में ....
कुछ दिनों बाद ...मेरी अस्थियों और राख क़ी खाद से ...
उत्सर्जित होगी एक अजस्त्र उर्जा और प्राण - वायु ...
जो पेढों कि टहनियों से होते हुए फूलों को ....
पुष्पित - पल्लवित करने में जुट जाएगी...
फिर किसी सुबह ....आँख मलते मेरे बच्चे.......
उन पेढों की सबसे ऊँची टहनी पर मुस्कराते हुए एक फूल में ...
मेरे मुस्कुराते चेहरे का "अक्श" देख कर सहसा बोल उठेंगे ....
"अरे पापा आप "........